के हर घूंट पर इसे बेवफा कह आंसू बहा रहे हैं।
ये बेवफा उस दिलरूबा सी दिखाई पड़ती है
जो भरी महफिल को अलविदा कर गई है।
ये उठ चुकी महफिल अब भी गुज़र नहीं पाई है।।
जागीर ये अब बैमान सी लग रही है।"
जिंदगी ऐसी ही है किसी जागीर सी और ये जागीर उस बेवफा सी जिसका अस्तित्व उस दीये की लौ सा है जो तेल के कंधों पर सवार खुद को निहारता है और इतराता है.. उसका इतराना और बढ़ जाता है जब तेल अपने अंत की ओर बढ़ता जाता है..फिर लौ चाहे इसे बेवफा ही क्यों न कहे।

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